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Great Wall Of India :- ‘ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया’ है विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार, एक साथ दौड़ सकते हैं 7 घुड़सवार: महाराणा कुंभा ने 15 वर्षों में कराया था निर्माण

मेवाड़ के शासक महाराणा कुंभा ने ‘संगीत राज’ जैसी महान रचना की है, जिसे साहित्य का ‘कीर्ति स्तंभ’ माना जाता है। उन्होंने ‘चंडी शतक’ और ‘गीत गोविंद’ आदि ग्रंथों का टीका लिखा था। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, महाराणा कुंभा ने ‘कामसूत्र’ जैसा ही एक ग्रंथ भी लिखा था।

चीन की महान दीवार (Great Wall of China) विश्व की सबसे लंबी दीवार है, जो दुर्गम पहाड़ियों के बीच बनाई गई है। इसलिए इसे विश्व के सात आश्चर्यों में शामिल है, लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह दीवार भारत में स्थित है। राजस्थान के कुंभलगढ़ में बनाए गए इस किले को महान क्षत्रिय राजा महाराणा कुंभा (Rana Kumbha) ने 15वीं शताब्दी में बनवाया था। चित्तौड़गढ़ किले के बाद यह राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला है। इस किले का इतिहास बेहद गौरवशाली है। आइए जानते हैं कुंभलगढ़ किले के बारे में:

कुंभलगढ़ किले का निर्माण

मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने साल 1443 से 1458 ईस्वी के बीच लगभग 15 वर्षों में इसे बनवाया था। धरातल से लगभग 3,600 फीट की ऊँचाई पर बसे इस किले के चारों तरफ लगभग 38 किलोमीटर लंबा दीवार का निर्माण कराया गया है। इसकी दीवारें 15 फीट चौड़ी हैं और इस पर एक साथ 7 घुड़सवार चल सकते हैं। किले के अंदर बने कमरों के साथ अलग-अलग खंड हैं और उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए हैं। दुर्ग का निर्माण पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के बनवाये थे। इस सिक्के पर दुर्ग और उनका नाम अंकित था।

कहा जाता है कि इस किले के निर्माण के लिए जिस स्थान को चुना गया था, वह मौर्य वंश के सम्राट से जुड़ा है। इस स्थान पर मौर्य शासक सम्राट अशोक के द्वितीय पुत्र द्वारा निर्मित एक किला पहले से ही था, जो कि खंडहर बन गया था। उसी स्थान पर उस समय के प्रसिद्ध वास्तुकार ‘मदन या मंदान’ ने वास्तुशास्त्र के नियमों के तहत इस किले का निर्माण कराया था। महाराणा कुंभा स्वयं भी शिल्पशास्त्र के महान ज्ञाता थे।

इस किले में सैकड़ों बावड़ी, तालाब और कुएँ भी बनवाए गए थे, ताकि जल को संग्रहित किया जा सके और किले की जल की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। कहा जाता है कि किले के तालाबों से आसपास के गाँवों के किसानों को खेती के लिए जल की आपूर्ति भी की जाती थी।

महाराणा कुम्भा से लेकर महाराजा राज सिंह तक पूरा राज परिवार इसी किले में रहता था। महाराणा प्रताप सिंह का जन्म भी इसी इसी किले में हुआ था। उन्होंने मेवाड़ का शासन भी इसी किले से किया था। इतना ही नहीं, पृथ्वीराज चौहान और महाराणा सांगा का बचपन भी इसी किले में बीता था। 

कुंभलगढ़ किले से जुड़ी रोचक कहानी

इस किले से जुड़ी एक बेहद रहस्यमयी कहानी भी प्रचलित है। हालाँकि, कई इतिहासकार इसे किवदंती मानते हैं। कहा जाता है कि साल 1443 में जब महाराणा कुंभा ने इस किले के निर्माण का कार्य शुरू किया तो कई तरह की बाधाएँ सामने आने लगीं। इससे महाराणा काफी चिंतित हो गए।

उसी दौरान एक संत ने महाराणा कुंभा को इस किले के निर्माण से जुड़े रहस्य के बारे में बताया। संत ने कहा कि किले की दीवार का निर्माण तभी आगे बढ़ेगा, जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से बलिदान देगा। महाराणा को चिंतित देख एक अन्य संत अपना बलिदान देने को तैयार हो गए। संत ने कहा कि वे पहाड़ी पर चलते जाएँगे और जहाँ वे रूकेंगे वहीं उनकी बलि चढ़ा दी जाए। कहा जाता है कि लगभग 36 किलोमीटर चलने के बाद संत पहाड़ी पर एक स्थान पर जाकर रूक गए। इसके बाद वहीं उन्होंने अपनी बलि दे दी। इसके बाद दीवार का निर्माण पूरा हुआ।

‘अजेयगढ़’ के नाम से विख्यात कुंभलगढ़ किला

राजस्थान के राजसमंद जिले में पहाड़ियों के बीच बने कुंभलगढ़ को ‘अजेयगढ़’ के नाम से भी जाना जाता है। अजेयगढ़ का अर्थ हुआ, ऐसा गढ़ जिसे जीता ना जा सके। इस किले को जीतना किसी भी शासक के लिए बेहद ही मुश्किल रहा है। इस किले की एक विशेषता यह भी है कि यह भव्य किला वास्तव में कभी युद्ध में नहीं जीता गया था। कहा जाता है कि इस किले की रक्षा गहलोत या सिसोदिया वंश की कुलदेवी बाणमाता स्वयं करती हैं।

कुंभलगढ़ किले में कुल 13 दरवाजे हैं। इसका ‘आरेठ पोल’ नामक दरवाजा केलवाड़े कस्बा के पास बना है। यहाँ पर बेहद सख्त पहरा हुआ करता था। यहाँ से करीब एक मील की दूरी पर ‘हल्ला पोल’ है। वहाँ से थोड़ा और आगे ‘हनुमान पोल’ है। हनुमान पोल के पास ही महाराणा कुंभा द्वारा स्थापित और नागौर से विजित भगवान हनुमान की मूर्ति है। इसके बाद ‘विजय पोल’ दरवाजा आता है। यहीं से प्रारम्भ होकर पहाड़ी की एक चोटी बहुत ऊँचाई तक चली गई है। इस स्थान को ‘कटारगढ़’ कहते हैं। विजय पोल से आगे बढ़ने पर भैरव पोल, नीबू पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल तथा गणेश पोल आते हैं। गणेश पोल के सामने वाली समतल भूमि पर गुम्बदाकार महल तथा देवी का स्थान है।

इतिहासकारों के अनुसार, इस किले को जीतने के लिए कई आक्रमण हुए। पहला आक्रमण महाराणा कुम्भा के शासनकाल में 1457 में अहमद शाह प्रथम ने किया, लेकिन उसकी कोशिश नाकाम रही। उसके बाद महमूद खिलजी ने 1458 और 1467 में आक्रमण किया, लेकिन दोनों बार उसे हारकर वापस लौटना पड़ा। कहा जाता है कि जब खिलजी किले को जीतने में नाकामयाब रहा तो गहलोत या सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी बाणमाता माता की भव्य प्रतिमा को खंडित कर लौट गया।

इसके बाद गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने इस दुर्ग को जीतने की हसरत लेकर आक्रमण किया, लेकिन वह भी असफल रहा। उसके बाद मुगल आक्रांता अकबर ने अपने सेनानायक शाहबाज खाँ को विशाल सेना के साथ दुर्ग पर आक्रमण करने के लिए भेजा। कहा जाता है कि मुगल आक्रमणकारियों ने किले में घुसने के लिए तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी देकर उनसे किले का गुप्त रास्ता जान लिया। हालाँकि गुप्त द्वार जानने के बाद भी वे किले के अंदर नहीं आ पाए। बाद में धोखे से इस इस किले के जलस्रोतों में जहर मिला दिया था।

कुंभलगढ़ दुर्ग के संबंध में मुस्लिम इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा कि यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि इसे नीचे से देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है। कुंभलगढ़ किले के भीतर भी एक दुर्ग है, जिसे ‘कटारगढ़’ के नाम से भी जाना जाता है। यह गढ़ सात विशाल द्वारा और मजबूत प्राचीरों से सुरक्षित है। इस दुर्ग के भीतर बादल महल और कुंभा महल हैं।

कुंभलगढ़ और पन्नाधाय

कहा जाता है कि इसी कुंभलगढ़ किले में पन्ना धाय नाम की ‘धाय माँ’ (पालने वाली माँ) ने महाराणा प्रताप के पिता राजकुमार उदय सिंह की जान बचाई थी। कहा जाता है कि जब राजपरिवार के बनवीर ने राजकुमार उदय सिंह सिंह की सोते समय हत्या करने का कुचक्र रचा तो इसकी जानकारी पन्ना धाय को हो गई। बाद में उन्होंने राजकुमार उदय सिंह की जगह अपने बेटे चंदन को सुलाकर उसकी बलि दी और राजकुमार उदय सिंह की जान बचाई थी।

बाद में राजकुमार उदय सिंह का पालन-पोषण इसी कुंभलगढ़ में छिपाकर किया गया और आगे चलकर मेवाड़ के महाराणा के रूप में इसी किले में उनका राज्याभिषेक हुआ। 1537 ई. में महाराणा उदय सिंह ने बनवीर को परास्त कर चित्तौड़ पर किया था। महाराणा उदय सिंह ने इसी कुंभलगढ़ से मेवाड़ का शासन किया।

विश्व विख्यात नीलकंठ मंदिर सहित 360 मंदिर

इस भव्य किले के अंदर की मुख्य इमारतें बादल महल, शिव मंदिर, वेदी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर और ममदेव मंदिर, पारस नाथ मंदिर, गोलरा जैन मंदिर, माताजी मंदिर, सूर्य मंदिर और पिटल शाह जैन मंदिर सहित लगभग 360 मंदिर हैं। इनमें से 300 जैन मंदिर हैं और 60 हिंदू हैं।

इनमें सबसे प्रसिद्ध नीलकंठ मंदिर है। नीलकंठ महादेव मंदिर में लगभग 5 फीट की ऊँचाई का एक विशाल शिवलिंग है। महाराणा कुंभा जब भी किसी लड़ाई के लिए जाते थे तो सबसे पहले नीलकंठ मंदिर में दर्शन कर निकलते थे और लड़ाई जीत कर आने पर सबसे पहले विजय को नीलकंठ महादेव को अर्पित करते थे। ऐसा कहा जाता है कि महाराणा कुंभ शरीर में इतने विशाल थे कि वह जब शिवलिंग का ‘अभिषेक’ करते थे तो बैठे-बैठे ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाया करते थे।

महाराणा कुंभा ने किले में एक यज्ञ वेदी का भी निर्माण करवाया था। राजपूताना में प्राचीन काल के यज्ञ-स्थानों का यही एक स्मारक शेष रह गया है। दो मंजिला भवन के रूप में इसकी इमारत शेष है। उसके ऊपर एक गुम्बद है और गुम्बद के नीचे वाले हिस्से से धुआँ निकलने का प्रावधान है।

कौन थे महाराणा कुंभा

महाराणा कुंभा गहलोत या सिसोदिया वंश के परम प्रतापी शासक थे, जिन्होंने एक भी युद्ध नहीं हारा था। उनका असली नाम महाराणा कुंभकर्ण था और लोग उन्हें प्यार से महाराणा कुंभा कहते थे। उनके पिता का नाम महाराणा मोकल और दादा का नाम महाराणा लाखा था। वह 1433 से 1468 तक मेवाड़ के महाराणा थे। उनका राज्य रणथंभौर से आज के मध्य प्रदेश के ग्वालियर तक फैला हुआ था। उनके साम्राज्य में वर्तमान राजस्थान और मध्य प्रदेश का बड़ा भूभाग शामिल था। महाराणा कुंभा ने 35 साल की उम्र तक 84 में से 32 किलों (Forts) का निर्माण करवाया था।

युद्ध के अलावा महाराणा कुंभा को अनेक दुर्ग और मंदिरों का निर्माण कराया था। उनका शासन काल स्थापत्य युग के स्वर्णकाल के नाम से जाना जाता है। चित्तौड़ में स्थित विश्वविख्यात ‘कीर्ति स्तंभ’ की स्थापना महाराणा कुंभा ने करवाई थी। उन्होंने ‘संगीत राज’ जैसी महान रचना की है, जिसे साहित्य का ‘कीर्ति स्तंभ’ माना जाता है। उन्होंने ‘चंडी शतक’ और ‘गीत गोविंद’ आदि ग्रंथों का टीका लिखा था। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, महाराणा कुंभा ने ‘कामसूत्र’ जैसा ही एक ग्रंथ भी लिखा था। इसके साथ ही खजुराहो में जिस तरह की मूर्तियाँ हैं, उसी तरह की मूर्तियाँ उन्होंने अपने राज में भी बनवाया था।  

महाराणा कुंभा के बारे में कहा जाता है कि वे इतने शक्तिशाली शासक थे कि आमेर और हाड़ौती जैसे ताकतवर राजघरानों से भी टैक्स वसूला करते थे। महाराणा कुंभा को एक उदार शासक के रूप में याद किया जाता है। कहा जाता है कि वे अपने राज में जहाँ भी लोगों को प्यासा देखते थे, वहीं कुआँ और तालाब खुदवा दिया करते थे। उनके शासनकाल में बड़ी संख्या में तालाबों और बावड़ियों का निर्माण किया गया था। 

UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल

विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली की पहाड़ियों में बने इस किले पर से कुंभलगढ़ के रेगिस्तान का नजारा साफ दिखाई पड़ता है। इसके चारों ओर 13 पर्वत शिखर हैं, जो इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। इस किले को साल 2013 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची (UNESCO World Heritage Site) में शामिल किया गया है। इसे ‘भारत की महान दीवार’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे मेवाड़ का किला भी कहा जाता है।

इस किले में ‘कुंभास्वामी’ नाम का विष्णु मंदिर है। मंदिर में क्षत्रिय शैली में अत्यंत कलात्मक और सजीव प्रतिमाएँ स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर के प्रांगण में पत्थर की शिलाओं पर महाराणा कुंभा ने प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई थीं।

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